गंभीर रोगों की दवा हैं जंगली पौधे

खरपतवार समझकर किसान ब्रज में खत्म कर रहे हैं इन जंगली बूटियों को। ब्रज अंचल हो या अन्य क्षेत्रीय वनौषधियां यहां खत्म होती जा रही हैं। पशुओं के रोग हों या मानव स्वास्थ्य सभी से इनका गहरा नाता रहा है। खरपतवार समझकर खत्म की जा रहीं यह सभी औषधियां बहुत उपयोगी हैं। इन पर हर अनुसंधान संस्थान में काम चल रहा है। यहां जीएलए विश्वविद्यालय में सेवानिवृत्त डीएचओ बीएल पचौरी एक हर्बल वाटिका बनाकर इस पर काम कर रहे हैं। आइए जानें कौन-सी हैं यह औषधियां और कितनी उपयोगी हैं। फरास का पेड़ ब्रज का मुख्य वृक्ष रहा है। वर्तमान में यह विलुप्त होने के कगार पर है। इसे गर्मी का कुचालक माना जाता है। जिस खेत की मेंढ़ पर यह पौधा खड़ा हो वहां फसल को पाला नहीं मार सकता। गर्मी का प्रभाव इसके 50 मीटर से ज्यादा दूरी तक नहीं हो सकता। यह वृक्ष महाभारत कालीन है। कहा जाता है कि इस वृक्ष पर आकाशीय बिजली नहीं गिरती। इसीलिए बरसात के दिनों में जंगली जीव इसके नीचे शरण लेते हैं। खारे पानी में मौजूद तत्व कार्बन डाई एवं मोनो आक्साइड आदि को खत्म करता है। खारे पानी में उत्पन्न होने वाली गैस को खत्म करता था। इसकी पत्ती खिलाने से जानवरों का दूध बढ़ता है।

झरबेरी

jharbari

झरबेरी जंगलों में लगातार घट रही है। राजस्थान में आज भी इसे पशुओं के चारे में प्रयोग में लाया जाता है। इससे दूध की पौष्टिकता के साथ घी में सुगंध बढ़ती है। इसके साथ यह पशुओं को कई बीमारियों से दूर रखता है।

बरना

barna

बरना का पेड़ ब्रज में बहुतायत में हुआ करता था। इसे वरुण देवता का द्योतक माना जाता है।इस वृक्ष से सूखा पड़ने की सूचना तीन माह पहले ही मिल जाती थी। यह गर्मी में अच्छा फल फूल रहा हो तो समझ जाता था, इस बार बरसात अच्छी होंगी। अन्यथा सूखा पड़ेगा। गलाघोंटू के लिए इसकी लकड़ी को पशुओं के गले में बांधा जाता है। इसकी छाल का काढ़ा आज भी आदिवासी अपने पशुओं को रोग संक्रमण से बचाने के लिए पिलाते हैं।

कदंब

kadamb

कदंब के पास गाय बांधने से पशु में दूध बढ़ता और प्रजनन क्षमता में सुधार होता है।इसीलिए भगवान कृष्ण ने सारी लीलाएं इसके पास कीं। इसके साथ ही इससे गेस्ट्रिक ट्रबल खत्म होती है। विषाणु एवं जीवाणुनाशी है।

करील

kareel

करील को हमने मिटा दिया है। दिल के रोगों, ब्लड प्रैसर का समाधान इस वृक्ष से होता है। गर्मी से बचने के लिए काम आता है। मिर्गी रोग के लिए इसकी कोपल व फूल की सब्जी बनाकर खाई जाती थी। इसके फल टैंटी का अचार आज भी चाव से खाया जाता है।

सहजन

sehjan

सहजन का वृक्ष हमारी जमीन को भी ठीक करता है।गठिया से जुड़े रोगों को दूर करता है। इसकी छाल व जड़ काम में आती है। गंभीर गैस्ट्रिक रोगियों को सहजन का मुरब्बा खाने की सलाह वैद्य आज भी देते हैं।

गोंदी

gondi

गोंदी ब्रज की मुख्य वनौषधि थी। इसे सरस्वतीजी का द्योतक माना जाता था। गले के रोगों के लिए इसकी पत्ती प्रयोग में लाई जाती थी। गले के छाले या कष्ट इसकी पत्तियों से खत्म न हों तो समझ जाता था कि कोई गंभीर रोग होने वाला है।

पीलू

पीलू  ब्रज का प्रमुख वृक्ष रहा है। राधा- कृष्ण की लीलाओं में भी इसका जिक्र आता है। यहां इसे खड़ार के नाम से भी जाना जाता है। इसकी जड़ अरब देश में मुस्लिम, बहुतायत में प्रयोग करते हैं। यहां भी लोग एक दशक पूर्व तक इसकी टहनियों को दातुन के रूप में प्रयोग करते थे। यह मुख के रोगों के लिए वरदान है। दांतों के रोग पायरिया आदि को दूर करने के गुण इसमें विद्यमान हैं।

पसैंदू ‘तमाल’

tamal

पसैंदू तमाल वृक्ष खुरपका मुंहपका में इसके पके फलों को घाव पर बांधते थे। फलों को पानी में उबालकर संक्रमित स्थान को धोते थे। इसके नीचे बच्चों को नहलाने से त्वचा रोग दूर होते हैं। गुजरात में भी यह पाया जाता है। ज्यादा पानी वाले क्षेत्रों में पैरों की उंगलियां गलने के रोग दूर करने में इसका प्रयोग होता है। इसके बीजों में नाइट्रोजन ज्यादा होती है। इसीलिए किसान इसके नीचे की मिट्टी खेतों में डालते थे। इसे श्याम तमाल के नाम से भी जाना जाता है। इंडोनेशिया में इसके फल को आम की तरह प्रयोग करते हैं।

मेरेला ‘वन मैथी’

methi

मेरेला ‘वन मैथी’ जानवरों का दूध बढ़ाती है। मरुआ की सुगंध अच्छी होती है। कीटनाशक गुण होने के कारण बच्चों के पेट में कृमि होने पर गुदा मुख पर लगाया जाता है। इसका रायता पीने से गैस्ट्रिक ट्रबल खत्म होती है। इसके नीचे सर्प नहीं आता है। यदि आ भी जाए तो वह इस पौधे के दायरे में आने पर निष्क्रिय हो जाता है। इसका प्रयोग मिर्गी रोग में भी किया जाता है।

ऊंट कटेरा

unth

ऊंट कटेरा जंगली खरपतवार है। यह जानवारों के दूध बढ़ाने में काम आता है। गर्भाधान की क्रिया को ठीक करता है। हरे चारे के रूप में इसके सेवन से पशु दूसरे ब्यांत में दूध अच्छा देता है। ग्लायडिया विदेशी पुष्प है। यह गर्मियों में भी यहां अच्छा होता है। ब्रज में चूंकि खारी पानी की समस्या है। इसलिए इसकी खेती खारी पानी वाले इलाकों में बहुत अच्छी हो सकती है।

चंद्रसूर

chandraasur

चंद्रसूर बहुत पुराना गठिया रोकने एवं महिला व पशुओं में दूध कम उतरने की समस्या को कम करने के काम में आता है। मान्यता है कि इसके पत्ते पर बच्चों को बैठकर खिलाने से उनमें वजन बढ़ता है। यह क्षारीय भूमि में होता है। पहले यह मेंथी के साथ होता था।

कलिहारी

kalihari

कलिहारी की जड़ छह फीट नीचे तक जाती है। इसमें क्रोमोजोम बहुत होते हैं। पहले फसलों का उत्पादन बढ़ाने के काम आता था। प्रसव से पहले बच्चा आसानी से नहीं होता तो सिर से पैर तक इसका लेप किया जाता था। क्रोमोजोम की संख्या के चलते पहले ब्रीडिंग में भी इसका उपयोग करते थे। अब वैज्ञानिकों के अन्य आधुनिक संसाधन विकसित कर लिए हैं तो इसकी उपयोगिता खत्म हो गई है।

लटजीरा

latjeera

इसे ब्रज में ओंगा के नाम से जाना जाता है। यह एण्टी एलर्जिक, एण्टी सेप्टिक एवं एण्टी वायरल गुणों वाला होता है। इसको चारे के रूप में खिलाने से पशुओं की आधी बीमारी खत्म हो जाती हैं। हड्डी टूटने पर इसके पत्तां को घी के साथ छौंक करके पशुओं को खिलाया जाता था। इसकी जड़ बहुत उपयोगी है। लोग इसकी दातुन भी करते थे। गर्भाशय के रोगों में भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसके चावल खाने से भूख नहीं लगती।

दूब घास

doob-laas

दूब घास को हम सब भूल रहे हंै। यह नीली, हरी, गांदर, और सफेद चार तरह की होती है। यह एण्टी वायरल, एण्टी बैक्टीरयल व एण्टी सेप्टिक होती है। इसके रस से बच्चों की नकसीर व महिलाओं का प्रदर की बीमारी दूर होती है। कॉलेस्ट्राल को कंट्रोल करती है। गांवों में चेचक मोतीझला होने पर नीम के साथ घर में या मुख्य द्वार पर इसे लगाया जाता है। जरूरत इस बात की है कि किसान इन वनौषधियों के महत्व को समङों और इनका उपयोग करें।